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कटाक्ष (बिहार विधानसभा चुनाव से पहले का लिखा हुआ)

नीतीशे कुमार के लिए.. अपराधियों का मन बढा, उनकी आई बहार व्यापारी मारे जा रहे, मंदा है व्यापार दारु, बंद बालू बंद, रो रहा बाजार बिल्डिंग रोज बन रहे, दारु भी मिल रहा भरे बाजार तस्कर और माफिया, कर रहे पुलिस की जय जयकार युवा है परेशान, मांग रहे रोजगार शिक्षक तो डूबे ही हैं, शिक्षा का भी हो गया बंटाधार अफसरशाही चरम पर है, व्याप्त है भ्रष्टाचार इतना होने पर भी, किस मुंह से आप आएंगे हमारे द्वार आप ही बताइए, काहे नय करे विचार 15 सालों से आप ही हैं सर्वेसर्वा, चला रहे सरकार कैसे आप पर भरोसा करें, कैसे चुने फिरो एक बार सोच के देखिए हमार माननीय मुख्यमंत्री नीतीशे कुमार। लालु के लाल के लिए पर न भूले लालु के लाल हमें आज भी याद है,  आपके दौर के कारनामें और कमाल, सडको पर बहती थी नाली, खून से रंगता था बाजार। उद्योग में भले अव्वल थे, पर वो व्यापार भी था कमाल, अपहरण व्यापार चरम पर था, हत्यारे होते थे मालामाल, यह धंधा न मंदा था, न चलता था उधार। बिहारी शब्द एक गाली था, बिमारु कहलाता था अपना बिहार। #LaluKeLal आप भी रखना ख्याल।

इन बच्चों कल कैसा होगा?

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पिता किसी इंसान के जिंदगी का वो खंभा होता है जो कोई भी भार सह सकता है, कच्ची उम्र मे पिता का साथ छूट जाना उस बच्चे को मानसिक अंपगता की ओर जे जाती है, बहुत बार ये अपंगता दिखता नहीं है पर भीतर ही भीतर घर कर जाता है। चार बच्चे जो अभी अभी अपने पिता को मुखाग्नि देके आया हो और चारों के मन में एक ही विचार चल रहा हो कि आखिर बदला कैसे लें... ये विचार ही उन बच्चों को कातिल बना सकता है। ये तो तय है कि आग लग चुकी है जो किसी भी तरह के पानी से बुझेगी नहीं पर सवाल है कि क्या इस बदले की भावना को जन्म देने के ही लिए हम इस सुशासन और विकास वाली पार्टियों को जिताने में अपना सबकुछ दाव पर लगा दिए। महमदपुर में जो घटना हुई उसमें साफ तौर पर सत्ता संरक्षण मे पले संगठित अपराध की झलक मिलती है... चाहे प्रवीण झा का रावण सेना का गठन हो या मछली/पोखर विवाद में सिर्फ संजय सिंह का जेल जाना, इससे साफ है कि खाकी और खादी के संरक्षण में एक आतंकवादी सरीखे गैंग चल रहा है जिसके मुखिया स्थानीय भाजपा विधायक के करीबी प्रवीन झा हैं। एक परिवार में अगर 5 लोग हैं तो भी सभी का किसी विषय पर एकमत होना मुश्किल होता है पर यहाँ...

बिहार में परीक्षा और प्रति व्यक्ति आय

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बिहार बोर्ड वो संस्था है जिसके कंधो बिहार में दशवीं और बारहवीं के परीक्षाओं का जिम्मा है या यों कहें कि बोझ है। जहाँ परीक्षा परीक्षा न होकर त्योहार और मेला बन जाता हो वहाँ कोई भी संस्था इस जिम्मेदारी को बोझ ही मानेगी। शायद ही कोई साल हो जब बिहार बोर्ड बेदाग साबित हुआ हो, 2021 भी बिहार बोर्ड के लिए वही रहा, पेपर लीक, टॉपर घोटाला, खिडकियों से पर्ची पहुंचाना ये सब तो बिहार बोर्ड मे दशकों से आम बात है। एक और खबर है प्रति व्यक्ति आय से संबंधित, हम बिहारी अपने बच्चों को कैसे भी करके परीक्षा पास कराने में विश्वास रखते हैं, लेकिन जब प्रति व्यक्ति आय की बात आती है तो हम फिर फेल साबित होते हैं। आखिर कमी कहाँ रह जाती है कि हर बार की तरह किसी भी तरह रैंकिंग में सबसे निचले पायदान पर आ जाते हैं। जब तक ये नहीं सोचेंगे तब तक दुर्गा पुजा, छठ, होली जैसे त्योहारों में रेलवे प्लेटफार्म पर आम बिहारी लाईन ही लगाएंगे। नीचे के फोटो मेंं जो अमीरी दिख रही है वो सलाना है मासिक नहीं।

सरकारी नौकरी और बिहारी

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एक मध्यमवर्गीय बिहारी अपने बच्चे के पैदा होते ही उसका भविष्य सिर्फ और सिर्फ सरकारी नौकरी में देखता है। ये कोई गलत बात भी नहीं है लेकिन अगर गौर करें कि आखिर सिर्फ यही सोच हमारे यहाँ क्यों जगह बना पायी है? बिहार मे सरकारी स्कूल के बारे सोच ऐसी बनी हुई है कि विद्यार्थी और शिक्षक दोनों के लिए ये समय काटने का एक उपयुक्त जगह है, एक आदमी सरकारी शिक्षक बनने के लिए हर जतन करता है, उसका लक्ष्य सिर्फ शिक्षक नहीं बल्कि सरकारी शिक्षक बनना होता है, सरकारी शिक्षक बनते ही सर का बहुत सारा बोझ एक साथ हलका हो जाता है, न रिसेशन का डर और न ही ज्यादा पढाने का दबाव उपर से उपरी कमाई भी अच्छी खासी हो ही जाती है तो कौन सिर्फ शिक्षक बनना चाहेगा। आप एक पिता के तौर पर जब ये सब देखते हैं तो आपको भी अपने बच्चों के लिए यही सब अच्छा लगने लगता है। उपरी कमाई, ये वही सोच है जो एक अच्छे खासे ग्रेजुएट को भी किसी प्रखंड कार्यालय में एक कम्प्यूटर ऑपरेटर बनने के लिए प्रेरित करता है। भले आप अपने बच्चे को एक चौकीदार बनाने में सफल हुए हों पर इस बात से आश्वस्त हो जाते हैंं कि उपरी कमाई तो होगी हीं। तो मेरे हिसाब से भ्रष्टाचार या ...

जातिवाद और बिहार

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अभी किसान आंदोलन में खाप पंचायत का भी जिक्र हुआ। हमारे बिहार में इस तरह की पंचायतें नहीं हैं लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब के कुछ हिस्सों में इस तरह की पंचायतें आज भी बजूद में है, इन पंचायतों में सबसे खास बात ये है कि ये लोगों को अपनी जडों से जोडे रखती है, ये जात और वंश के आधार पर बनाई गई पंचायत है। लेकिन खाप पंचायत हमेशा सुर्खियों में तब रही जब मसला अंतर जातीय प्रेम का हुआ। खाप पंचायत कभी भी इस तरह के प्यार मोहब्बत के पक्ष में नहीं रही है और जो भी अंतरजातीय प्यार या शादी का मामला इन तक पहुंचा उसका अंजाम बहुत बुरा हुआ, अंंतर जातीय मोहब्बत के मामले मे खाप हमेशा ऑनर किलिंग का आदेश देकर सुर्खियों में रहा। ऑनर किलिंग के बहुत सारे किस्से अखबारों के कोने में दब के रह जाते हैं पर जब बात बिहार की आती है तो हम बिहारियों को कट्टर जातिवादी घोषित कर दिया जाता है जबकि ऑनर किलिंग का शायद ही कोई मामला यहाँ दिखता है । धर्म और जाति हर व्यक्ति के जीवन का हिस्सा है पर 90 के दौर के नेताओं ने इसे राजनैतिक हथियार बनाने का प्रयोग भर किया और वो सफल रहे। मंडल कमीशन की सिफ...

दर्द-ए-बिहार

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अभी हाल में मनोज वाजपेयी का एक गाना आया "मुंबई मेंं का बा", उसमें बिहार के एक खास वर्ग का जिक्र बहुत ही बढिया और वास्तविक तरीके से किया गया। ये वो वर्ग है जिसे किसी भी मंच या कागज पर मानव संसाधन कहा जाता है पर सच्चाई उससे कहीं अलग है, वास्तव में इस वर्ग को बंधुआ मजदूरों से भी दोयम दर्जे का माना जाता है। ये वही वर्ग है जिसे लॉकडाउन के समय आप और हम  सडकों पर आवारा पशुओं की तरह दौडते हुए देख चुके हैं, ये वही वर्ग जो लॉकडाउन खत्म होने से पहले ही बसों और ट्रेनों में लदकर फिर से उसी जिंदगी को जीने जाते हुए भी देखे, पापी पेट का हिसाब भी तो करना है सभी को। बिहार भले ही स्वच्छता, शिक्षा, स्वास्थ्य, सडक, बिजली, पानी, उद्योग, पर्यटन आदि के मामले में सबसे निचला दर्जा पाता हो पर जब बात आबादी की होती है तो बिहार का नाम ऊपर से खोजने पर 1/2/3 के आस पास ही मिल जाता है। ऐसा क्या है कि बिहारी सिर्फ बच्चे पैदा करने में ही अव्वल है( अगर कोई कहे कि बिहार सबसे ज्यादा IAS/IPS देता है तो पिछले पाँच साल का रिकॉर्ड देख लें)? क्या नहीं था बिहार के पास 1990 के पहले के बिहार को देखने और समझने ...

श्मशानघाट का अनुभव

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जब आप कभी श्मशान जाएंगे तो एक एहसास आपको जरूर आएगा, उस एहसास भर से एक पल लिए ही सही पर शरीर मे सिहरन आ जाएगी, वो एहसास ये है कि आपको भी एक दिन यहींं आना है, लेकिन उस दिन आप आप नहीं होंगे उस दिन लाश कहलाएंगे आप और उस बेजान शरीर को जिसके बल पर आप दुनिया जीतने का दंभ भरते थे,भी उसी तरह के लकडी के ढेर पर रखा जाएगा और फिर कुछ देर में आग के हवाले और कुछ घंटो में खेल खत्म। आपके अपने बहुत सारे मुश्किल वक्त देखे होंगे, पर ये अंतिम कुछ घंटे उनके लिए सबसे मुश्किल होते हैं, वो आपकी लाश के पुरी तरह जलने में लगने वाले वक्त से चिढ जाते हैं, वो गंगा घाट पर बहने वाली तेज हवा को भी गाली देने से नहीं चूकते है कि आज ही इतना तेज चलना था इसे। ये वृध्दावस्था बडा ही खराब दौर है पर आना सभी के साथ है, आप जिन बच्चों के लिए दुनिया की हर खुशी खरीद लेना चाहते थे वही बच्चे आपके अंतिम वर्षों में दुनिया का सबसे गलीच आदमी सिद्ध कर देता है। कल आप अपने सगे भाई से लडकर जिस जमीन पर हक जमा बैठे थे उस जमीन की फसल से आप ही के बच्चे आपके लिए दवाई भी नही खरीद पाते हैं, लेकिन जैसे ही आप आप न रहकर लाश बन जाते हैं, उस ...