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मुफ्तखोरी की कटोरी

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आज हम इक्कीसवी शताब्दी में जी रहे हैं, मतलब सबसे तेज, सबसे आधुनिक, सबसे नया शताब्दी। इस समय इंसान के लिए नामुमकिन नाम की कोई शब्द न के बराबर है, माने इंसान जो चाहे वो करने में सक्षम है, बस उसे आलस का आदत न लगे तो। आलस मतलब उसका काम किसी और के भरोसे हो जाना, मतलब बिना मेहनत किए काम हो जाना, मतलब मुफ्त मे काम हो जाना। तो आज भारत में उसी मुफ्तखोरी का एक नजारा देखते हैं, तो शादी से ही शुरू करते हे, शादी करने के पैसे, शादी के बाद बच्चे पैदा करने को पैसे, फिर बच्चे पैदा न करने को पैसे, फिर बच्चे की शिक्षा के पैसे, मुफ्त भोजन, मुफ्त किताब, मुफ्त साइकल, स्कूली शिक्षा के बाद पैसे, कॉलेज जाने के पैसे, कॉलेज के बाद स्कोलेरशिप के नाम पे पैसे, फिर रोजगार न मिलने पर पैसे, फिर रोजगार खोजने के पैसे, खेती करने को पैसे, घर बनाने के पैसे, फिर अनाज के लिए पैसे, गैस के लिए पैसे, शौचालय बनवाने के लिए पैसे, टीवी देखने को पैसे, कुकर के लिए पैसे, जवानी में पैसे, बुढ़ापे में पैसे, इलाज के लिए पैसे, इलाज के बाद मर जाओ तो पैसे, जात के नाम पर पैसे, धर्म के नाम पर पैसे, धार्मिक यात्रा के लिए पैसे, धर्म की रक...