दर्द-ए-बिहार
अभी हाल में मनोज वाजपेयी का एक गाना आया "मुंबई मेंं का बा", उसमें बिहार के एक खास वर्ग का जिक्र बहुत ही बढिया और वास्तविक तरीके से किया गया। ये वो वर्ग है जिसे किसी भी मंच या कागज पर मानव संसाधन कहा जाता है पर सच्चाई उससे कहीं अलग है, वास्तव में इस वर्ग को बंधुआ मजदूरों से भी दोयम दर्जे का माना जाता है।
ये वही वर्ग है जिसे लॉकडाउन के समय आप और हम सडकों पर आवारा पशुओं की तरह दौडते हुए देख चुके हैं, ये वही वर्ग जो लॉकडाउन खत्म होने से पहले ही बसों और ट्रेनों में लदकर फिर से उसी जिंदगी को जीने जाते हुए भी देखे, पापी पेट का हिसाब भी तो करना है सभी को।
बिहार भले ही स्वच्छता, शिक्षा, स्वास्थ्य, सडक, बिजली, पानी, उद्योग, पर्यटन आदि के मामले में सबसे निचला दर्जा पाता हो पर जब बात आबादी की होती है तो बिहार का नाम ऊपर से खोजने पर 1/2/3 के आस पास ही मिल जाता है।
ऐसा क्या है कि बिहारी सिर्फ बच्चे पैदा करने में ही अव्वल है( अगर कोई कहे कि बिहार सबसे ज्यादा IAS/IPS देता है तो पिछले पाँच साल का रिकॉर्ड देख लें)?
क्या नहीं था बिहार के पास 1990 के पहले के बिहार को देखने और समझने पर पता चलता है कि बिहार का उद्योग उस दौर में दो भाग में बंटा हुआ था, दक्षिण बिहार (वर्तमान झारखंड) खनिज आधारित उद्योगों का केंद्र था तो उत्तर एवं कोसी क्षेत्र का बिहार खेती आधारित उद्योगों का, वहीं शाहाबाद क्षेत्र में मिश्रित उद्योग थे पर सिर्फ 10-15 सालों में स्थितियां पुरी तरह से बदल गई और 20-25 साल में तो यहाँ का मानव संसाधन मजूदर बनने पर मजबूर हो गया।
अभी बहुत कुछ बाकी है इस सीरीज में....
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