जातिवाद और बिहार
अभी किसान आंदोलन में खाप पंचायत का भी जिक्र हुआ।
हमारे बिहार में इस तरह की पंचायतें नहीं हैं लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब के कुछ हिस्सों में इस तरह की पंचायतें आज भी बजूद में है, इन पंचायतों में सबसे खास बात ये है कि ये लोगों को अपनी जडों से जोडे रखती है, ये जात और वंश के आधार पर बनाई गई पंचायत है। लेकिन खाप पंचायत हमेशा सुर्खियों में तब रही जब मसला अंतर जातीय प्रेम का हुआ। खाप पंचायत कभी भी इस तरह के प्यार मोहब्बत के पक्ष में नहीं रही है और जो भी अंतरजातीय प्यार या शादी का मामला इन तक पहुंचा उसका अंजाम बहुत बुरा हुआ, अंंतर जातीय मोहब्बत के मामले मे खाप हमेशा ऑनर किलिंग का आदेश देकर सुर्खियों में रहा।
ऑनर किलिंग के बहुत सारे किस्से अखबारों के कोने में दब के रह जाते हैं पर जब बात बिहार की आती है तो हम बिहारियों को कट्टर जातिवादी घोषित कर दिया जाता है जबकि ऑनर किलिंग का शायद ही कोई मामला यहाँ दिखता है ।
धर्म और जाति हर व्यक्ति के जीवन का हिस्सा है पर 90 के दौर के नेताओं ने इसे राजनैतिक हथियार बनाने का प्रयोग भर किया और वो सफल रहे। मंडल कमीशन की सिफारिशों के बलबूते ये राजनेता बिहार के सामाजिक ताने बाने एक ऐसा जहर घोल दिए जिससे बिहारियों को उभरने में अभी भी दशक लग सकता है।
लेकिन बिहार का जातिवादी चेहरा मुख्यतः चुनाव के समय ही दिखता है, नेता जैसे चाहते हैंं हमे जात पात के नाम बंदर बना के नचा लेते हैं फिर भी बिहार मिडिया तंत्र जाति के नाम पर हमेशा बदनाम किया जाता रहा है।
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