सरकारी नौकरी और बिहारी

एक मध्यमवर्गीय बिहारी अपने बच्चे के पैदा होते ही उसका भविष्य सिर्फ और सिर्फ सरकारी नौकरी में देखता है। ये कोई गलत बात भी नहीं है लेकिन अगर गौर करें कि आखिर सिर्फ यही सोच हमारे यहाँ क्यों जगह बना पायी है?
बिहार मे सरकारी स्कूल के बारे सोच ऐसी बनी हुई है कि विद्यार्थी और शिक्षक दोनों के लिए ये समय काटने का एक उपयुक्त जगह है, एक आदमी सरकारी शिक्षक बनने के लिए हर जतन करता है, उसका लक्ष्य सिर्फ शिक्षक नहीं बल्कि सरकारी शिक्षक बनना होता है, सरकारी शिक्षक बनते ही सर का बहुत सारा बोझ एक साथ हलका हो जाता है, न रिसेशन का डर और न ही ज्यादा पढाने का दबाव उपर से उपरी कमाई भी अच्छी खासी हो ही जाती है तो कौन सिर्फ शिक्षक बनना चाहेगा।
आप एक पिता के तौर पर जब ये सब देखते हैं तो आपको भी अपने बच्चों के लिए यही सब अच्छा लगने लगता है।
उपरी कमाई, ये वही सोच है जो एक अच्छे खासे ग्रेजुएट को भी किसी प्रखंड कार्यालय में एक कम्प्यूटर ऑपरेटर बनने के लिए प्रेरित करता है।
भले आप अपने बच्चे को एक चौकीदार बनाने में सफल हुए हों पर इस बात से आश्वस्त हो जाते हैंं कि उपरी कमाई तो होगी हीं।
तो मेरे हिसाब से भ्रष्टाचार या उपरी कमाई पहला कारण है कि बिहारी समाज इस ओर औरों से ज्यादा आकर्षित होता है।
वास्तव में हम अपने आसपास एक बहुत बडे भ्रष्ट समाज का निर्माण कर चुके हैं और यह भ्रष्ट समाज हमें और ज्यादा भ्रष्ट होने को उकसाता रहता है।
बडे अफसरों की बात तो कुछ और ही लेकिन हर छोटा ओहदा धारी कम स कम ये खुल के कहता है कि सबको खिलाना पडता है हर काम के लिए।
सरकारी नौकरी कोई ज्यादा दहेज आकर्षित करता है ये भी एक बडी वजह है इस ओर झुकाव होने के लिए, चाहे दहेज लेना सरकारी तौर पर जुर्म क्यों न हो पर सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक भी दहेज ही है। 
आज के लिए इतना ही...फिर बढेंगे इसी के साथ

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