दारु, बालू और सुशासन
ड्राय स्टेट बिहार, महाराष्ट्र और गोवा से ज्यादा दारू पी रहा है।
पहले बिहार के गांवों में एक दो जगह दारू मिलता था अब गांव शहर सा बर्ताव करने लगा, मन किया फोन घुमाओ, दारु घर पे हाजिर। बिहार में दारु और बालू हर साल नये दबंगों को भी जन्म दे रहा है, बालू और दारु वही बेच सकता है जो बाहुबल भी रखता हो, अरे लखीसराय का क्यूल नदी तो गवाह भी है बालू के लिए पुलिस से गोलीबारी का और सबसे बडी बात की छुटभैये बालू ट्रैक्टर के ड्राइवर भी खुद को "बालू माफिया" बोलने लगे हैं।
शादियां भले बिना सिंदूर के हो जाए पर बिन शराब शादी की कल्पना भी नहीं की जा सकती है, बाराती पहुंचे नहीं कि दारू पहले हाजिर, और बिन दारु नागिन डांस भी तो नहीं हो सकता, बस नागिन डांस के नाम पर दो चार पैग तो एक्स्ट्रा चेंप लिया जाता है, भला डीजे का पैसा भी वसूल करना होता है।
भ्रष्टाचार मुक्त बिहार की कल्पना भी इसी बालू और दारू के द्वंद में पिसता और घुटता रहा है, वैसे हम बिहारियों को पिसने का पुराना अनुभब रहा है, सो कॉल्ड "बालू माफिया" ऊंगलियों पर गिनवा देगा कि किस - किस को और कितना पैसा खिलाना होता है, आसान थोडे न है इ काम, वैसे ही "दारू माफियाओं" का भी अलगे रुतवा होता है हर सर्विस का चार्ज ऊ भी गिनवा सकता तबे उतना चैन से माफिया का टैग हासिल करता है बाकी सरकार माने नीतीशे कुमार तो सेंट्रल फंड्स के भरोसे बैठ के पेट्रोल और डीजल पर एक्सट्रा चार्ज वसूलते हैं, बिहार के सीमावर्ती जिलों के पेट्रोल पंप मालिकों को अलगे रोना रहता है लोग झारखंड से तेल भरवा लेते हैं वहां पेट्रोल ₹5 तो डीजल भी लगभग ₹3 सस्ता मिल जाता है, वही हाल उत्तर प्रदेश बॉर्डर से सटे जिलों का भी है, दारु हो या बालू इ दोनों के नुकसान का बोझ सुशासन बाबू के कोर वोटर हस्ते हस्ते उठा रहे, बाकी जंगलराज का डर भी कोई चीज है।
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