क्या ये बालात्कार की घटनाएं सुनियोजित है?
बालात्कार एक ऐसा शब्द जिसे सुनकर कोई भी एक पल के सिहर जाता है, चाहे वो पुरुष हो या महिला पर बच्चों का क्या, वो तो दस खिलौनों का नाम तक नहीं बता सकते। आज हम एक ऐसे दौर से गुजर रहे जहाँये शब्द आम बन गया है। अखबार हो या न्यूज का कोई दूसरा साधन या फिर सोशल मिडिया, खोलते ही सबसे ज्यादा दिखने वाला शब्द भी बालात्कार ही होता है।
पर जब बालात्कार के साथ धर्म का तडका लगता है तो यह बहुत बार न्यूज चैनलों, छुटभैय्ये नेताओं को फायदा पहुंचता है जैसे एक आशिफा बालात्कार केस का इस्तेमाल फिल्में प्रमोट करने के काम में आया, चंदा किये गये पैसे से अय्याशी के काम में आया, कुछ सुस्त पत्रकारों को मेनस्ट्रीम में आने का मौका दिया, कुछ नेताओं को केंडल मार्च के नाम पर राजनीति करने का भी मौका दिया पर आज वो सारे लोग आसिफा केस का अपडेट भी नहीं बता सकते।
बीच में एक और घटना घटी, नरेन्द्र मोदी प्रचंड बहुमत के साथ फिर से सरकार में आए, इससे बहुतों को लगा कि ये हिंदू अतिवादियों को बढावा देगा, देश के अल्पसंख्यक पहले से ही डरे हुए हैं ये जीत उन्हें और डराएगा पर हुआ उसके उलट, अब डरे हुए अल्पसंख्यक अब शायद आतंकवाद का रास्ता छोड चुके है, अब उनका रास्ता हिंदू काफिरों के घरों की ओर मुड चुका है, अब उन डरे हुए मासुमों को आतंकवाद से उनके गजवा ए हिंद का सपना पुरा होते नहीं दिख रहा तो उन मासुम ने दुसरा रास्ता अख्तियार किया और यह रास्ता है काफिरों के बच्चियों का बालात्कार।
अगर हाल के कुछ घटनाओं को देखा जाए तो उपर लिखी बातें शत प्रतिशत सही लगेंगे|
अप्रैल 2018 गाजियाबाद की एक 11 साल बच्ची का केस, अलीगढ के 2 साल की ट्विंकल का केस, मेरठ की 8 साल की बच्ची का केस, जमुई के निशा का केस इसी ओर इशारा करता है कि कहीं ये सारी घटनाएं सुनियोजित तो नहीं। केरल के लव जिहाद के मामले किसी से छुपी नहीं है कि कैसे वहां आए दिन प्यार के नाम पर हिंदू लडकियों को मोहरा बनाकर इस्तेमाल किया जाता है, केरल ही क्यों देश के दूसरे हिस्सों से भी इस तरह के मामले हर रोज सामने आते रहे हैं।
कुछ लोग इसे कठुआ के आशिफा का बदला बताने से भी नहीं चूक रहे|
वैसे मैं किसी भी घटना में धर्म और जाति नहीं देखता पर वर्तमान में परिस्थितियां इस ओर ही इशारा कर रही है।
पर जब बालात्कार के साथ धर्म का तडका लगता है तो यह बहुत बार न्यूज चैनलों, छुटभैय्ये नेताओं को फायदा पहुंचता है जैसे एक आशिफा बालात्कार केस का इस्तेमाल फिल्में प्रमोट करने के काम में आया, चंदा किये गये पैसे से अय्याशी के काम में आया, कुछ सुस्त पत्रकारों को मेनस्ट्रीम में आने का मौका दिया, कुछ नेताओं को केंडल मार्च के नाम पर राजनीति करने का भी मौका दिया पर आज वो सारे लोग आसिफा केस का अपडेट भी नहीं बता सकते।
बीच में एक और घटना घटी, नरेन्द्र मोदी प्रचंड बहुमत के साथ फिर से सरकार में आए, इससे बहुतों को लगा कि ये हिंदू अतिवादियों को बढावा देगा, देश के अल्पसंख्यक पहले से ही डरे हुए हैं ये जीत उन्हें और डराएगा पर हुआ उसके उलट, अब डरे हुए अल्पसंख्यक अब शायद आतंकवाद का रास्ता छोड चुके है, अब उनका रास्ता हिंदू काफिरों के घरों की ओर मुड चुका है, अब उन डरे हुए मासुमों को आतंकवाद से उनके गजवा ए हिंद का सपना पुरा होते नहीं दिख रहा तो उन मासुम ने दुसरा रास्ता अख्तियार किया और यह रास्ता है काफिरों के बच्चियों का बालात्कार।
अगर हाल के कुछ घटनाओं को देखा जाए तो उपर लिखी बातें शत प्रतिशत सही लगेंगे|
अप्रैल 2018 गाजियाबाद की एक 11 साल बच्ची का केस, अलीगढ के 2 साल की ट्विंकल का केस, मेरठ की 8 साल की बच्ची का केस, जमुई के निशा का केस इसी ओर इशारा करता है कि कहीं ये सारी घटनाएं सुनियोजित तो नहीं। केरल के लव जिहाद के मामले किसी से छुपी नहीं है कि कैसे वहां आए दिन प्यार के नाम पर हिंदू लडकियों को मोहरा बनाकर इस्तेमाल किया जाता है, केरल ही क्यों देश के दूसरे हिस्सों से भी इस तरह के मामले हर रोज सामने आते रहे हैं।
कुछ लोग इसे कठुआ के आशिफा का बदला बताने से भी नहीं चूक रहे|
वैसे मैं किसी भी घटना में धर्म और जाति नहीं देखता पर वर्तमान में परिस्थितियां इस ओर ही इशारा कर रही है।

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