अंहकारी और अनपढ़ के बीच पिसता लखीसराय

मुंगेर लोकसभा में मुंगेर के बाद लखीसराय ही दुसरा बडा शहर और जिला भी है, मुंगेर लोकसभा के 6 विधानसभा क्षेत्रों मेंं लखीसराय जिले से 2 विधानसभा क्षेत्र लखीसराय और सुरजगढा आता है पर अगर कहा जाए कि दो विधानसभा और एक बडी आबादी होने के बाद भी लखीसराय जिले का समुचित विकास नही हो पाया है तो वो भी गलत नहीं होगा।
अगर बात शिक्षा की करेंगे तो पाएंगे कि यहाँ कुछ नहीं है, जो है वो वैसे लोगों को थामे रखे हुएं हैं जो थोडे आर्थिक रुप से कमजोर हैं वरना बारहवीं के लिए भी पटना, भागलपुर जैसे शहरों की ओर रुख करते हैं। सरकारी विद्यालयों का हाल तो किसी झुपा हुआ नहीं हैं।
उद्योग के मामले में पुरे बिहार को देश अच्छे जानता है, भले हम जीडीपी में अव्वल आ गये पर देखा जाए तो उद्योग के मामले हम बाकी राज्यों के मुकाबले हम कहीं नही टिकते और फिर लखीसराय में बडे उद्योग की बात करना ही सही नहीं होगा और इस नाम पर नेताओं को कोसने से भी कुछ हासिल नहीं होगा। अब बात करते है कृषि प्रधान राज्य बिहार के लखीसराय की,  जिसकी देन कह लें पर खेती के मामलों में भी लखीसराय का नाम सिर्फ़ पटवन के नाम पर किसानों बीच गोली चलने और जर्जर जलाशयों को लेकर ही ज्यादा होता देखा गया है, उदाहरण के तौर पर बहुत से गांव है जहाँ पटवन को लेकर झगडे आम बात है और नेता जन सिर्फ़ जलाशयों का दौरा कर अपने दायित्वों की इतिश्री मानते है।
रेलवे की बात अगर हो तो कोई भी नेता वाहवाही लेने लायक नहीं है क्योंकि लखीसराय के जिले दो महत्वपूर्ण स्टेशन भौगोलिक रूप से ही भारतीय रेल के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हावडा-दिल्ली मुख्य रेलमार्ग मे पडता है और रेलवे को एक बडी आमदनी देता है फिर भी स्टेशनों पर जन सुविधाओं के लिए इन नेताओं को कभी भी आवाज उठाते सुना या देखा नहीं गया है।
सांसद के मामले में हम अनपढ़ और अहंकारी के बीच ही पिस के रह गये जैसे गेंहूँ के घुन।
चुनाव का मुद्दा जात होते ही विकास गायब हो जाता है, कोई जय भीम का नारा लगाता है तो चुपके या जोर से ब्राह्मण बाभन जिंदाबाद तो कोई इतिहास को याद कर बुलंद राजपुताना को बल देता है और विकास को ताखा पर रख दिया जाता है।

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