कल, आज और कल

पांचवीं में था उस समय जब किसी मुस्लिम से दोस्ती हुई और दशवीं से कालेज के दिनों तक बहुत सारे हुए साथ में रहना खाना पढना सब होता था न हमें कभी उनसे कोई बैर हुई न उन्हें कभी हमसे।
अरे मेरे गाँव में आज भी जब तजिया आता है मुहर्रम का तो हम उनको शरबत पिलाना नही भुले हैं, जैसे ये मेरे गांव का कोई पुरानी प्रथा हो, बिजली चले जाने पर सभी ओर से इंभ्रटर से चौक को रौशनी करना भी रिवाज ही है हमारा।
उस समय छोटा ही था 10-12साल का, होली का समय था 7-8बजे सुबह तो एक दो दिन पहले से रंग एक कर दिए थे, अचानक बगल के गांव वाले एक धान खरीदार पर नजर पडी और पिचकारी का सारा रंग उन्ही पे डाल दिए, वो हम पे गुस्सा गये और चूंकि मेरे घर सामने ही ये सब हुआ तो पापा को आवाज देकर बुलाए, बताए मेरे गलती के बारे में, पापा उन्हे समझा कर भेज दिए कि मुझे समझा देंगे।
बाद में पापा बताए वो मुस्लिम है और होली उनका पर्व नही है, मैं न ज्यादा कुछ समझ पाया न ही पापा से इस बारे में कोई सवाल किया।
दुसरी घटना कालेज के दिनों कोलकाता में, क्लासमेट का एक दोस्त रांची से कोलकाता आया था कहीं एडमिशन कराने, हमारे ही फ्लैट में रूका, संयोग से क्रिकेट मैच था वर्ल्डकप सेमीफाइनल भारत और पाक का, पाक सेमीफाइनल हार गया, हमारे मेहमान को बहुत ज्यादा बुरा लग गया, उस रात हमारे साथ खाने भी नहीं गया, हाव भाव एकदम अजीब और अगले दिन तक वैसा ही रहा फिर नार्मल हो गया और वापस भी लौट गया, मैं अपने दोस्त को बोला भाई ऐसा लोग दुबारा हमारे यहां नही आना चाहिए तो मेरे दोस्त ने मुझे इस तरह समझाया कि अरे उसके अब्बा की वुआ लाहौर की है इसलिए उसको लगाव है।
ये कल था अब आज को अगर देखें तो हर मुस्लिम डर में ही जी रहा है, हमारे पूर्व उपराष्ट्रपति महोदय भी इस डर के बारे में बता ही चुके है, हमारे मि. परफेक्शनिस्ट तो इतने डर गए थे कि वो देश छोडने को तैयार थे।
मेरी एक मुस्लिम महिला दोस्त जो मुझे भैया बोलती है कोलकाता में हमेशा हम लोगों से अच्छा संबंध रहा है पर आज वो भी सोशल मिडिया पर कभी इस डर से डरी होने का एहसास करा देती है।
आगे- भाग 2 में

Comments

Unknown said…
बहुत अच्छा
Unknown said…
बहुत अच्छा
Unknown said…
बहुत अच्छा
Unknown said…
अपने गांव की कहानी

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